पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- कर्नाटक ने अपने नवीनतम बजट में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध की घोषणा की है, और आंध्र प्रदेश 13 वर्ष से कम आयु वालों के लिए ऐसे सेवाओं के उपयोग पर रोक लगाने का प्रावधान लाने की दिशा में अग्रसर है।
परिचय
- यह भारत में बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से होने वाले विभिन्न हानियों से बचाने की बढ़ती पहल का संकेत है।
- आंध्र प्रदेश ने कहा है कि राज्य 90 दिनों के अंदर इसी प्रकार के नियम लागू करेगा।
- बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की मांग विश्वभर में तीव्रता से बढ़ रही है, जिसका उदाहरण विगत वर्ष लागू हुए ऑस्ट्रेलिया के ऐतिहासिक कानून से मिलता है।
अवयस्क बच्चों हेतु सोशल मीडिया प्रतिबंध
- यद्यपि भारत ने अभी तक केंद्रीय स्तर पर कोई नियामक कदम नहीं उठाया है, किंतु आईटी मंत्रालय में आयु-आधारित सोशल मीडिया प्रतिबंधों पर प्रारंभिक चर्चाएँ शुरू हो चुकी हैं।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी सरकार से बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग और उन पर लक्षित डिजिटल विज्ञापनों हेतु आयु-आधारित सीमाएँ लागू करने का आह्वान किया।
- सर्वेक्षण की सिफ़ारिशें युवाओं में बढ़ती “डिजिटल लत” संबंधी चिंताओं से प्रेरित थीं।
- इसमें यह भी कहा गया कि बच्चों के बीच साधारण उपकरण जैसे बेसिक फ़ोन या केवल शिक्षा-उन्मुख टैबलेट को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, साथ ही उपयोग सीमा और सामग्री फ़िल्टर लागू किए जाने चाहिए।
भारत में अवयस्क उपयोगकर्ताओं हेतु सोशल मीडिया प्रतिबंध/नियमन की आवश्यकता
- साइबरबुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न से सुरक्षा: बच्चे प्रायः ट्रोलिंग, दुर्व्यवहार और साइबरबुलिंग का शिकार होते हैं, जिससे चिंता, अवसाद एवं सामाजिक अलगाव उत्पन्न होता है।
- मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक कल्याण: सोशल मीडिया एल्गोरिद्म नशे जैसी स्क्रॉलिंग, अवास्तविक शरीर छवि और साथियों के दबाव को बढ़ावा देते हैं, जिससे किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
- हानिकारक या अनुपयुक्त सामग्री से बचाव: अवयस्क उपयोगकर्ता हिंसक, अश्लील या भ्रामक सामग्री से रूबरू हो सकते हैं, जो उनकी आयु और परिपक्वता के अनुरूप नहीं है।
- ऑनलाइन शिकारियों और शोषण से सुरक्षा: बच्चे ग्रूमिंग, यौन शोषण और तस्करी के जोखिमों के प्रति संवेदनशील होते हैं।
- स्क्रीन लत कम करना और शैक्षणिक ध्यान बढ़ाना: अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग से पढ़ाई का समय, एकाग्रता और शारीरिक गतिविधि घटती है।
- व्यक्तिगत डेटा और गोपनीयता की रक्षा: नाबालिग प्रायः अनजाने में निजी जानकारी साझा करते हैं, जिससे डेटा दुरुपयोग, पहचान चोरी और लक्षित हेरफेर का खतरा रहता है।
- भ्रामक सूचना और उग्रवाद से बचाव: बच्चे आसानी से फेक न्यूज़, प्रोपेगैंडा या हानिकारक ऑनलाइन चुनौतियों पर विश्वास कर सकते हैं, जिससे उनके निर्णय और व्यवहार प्रभावित होते हैं।
भारत में अवयस्क उपयोगकर्ताओं हेतु सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू करने की चुनौतियाँ
- आयु सत्यापन में कठिनाई: अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म स्वयं-घोषित आयु पर निर्भर करते हैं, जिससे नाबालिग झूठी जानकारी देकर खाते बना सकते हैं।
- कठोर सत्यापन हेतु पहचान-पत्रों की आवश्यकता हो सकती है, जिससे गोपनीयता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- तकनीकी और प्रवर्तन चुनौतियाँ: करोड़ों उपयोगकर्ताओं और अनेक प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लागू करना अत्यंत जटिल है।
- उपयोगकर्ता वीपीएन, वैकल्पिक खाते या लॉग-आउट ब्राउज़िंग के माध्यम से प्रतिबंधों को दरकिनार कर सकते हैं।
- नीति असंगति: यदि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग आयु सीमा अपनाई जाती है, तो कानूनी और परिचालन भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
- डिजिटल अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव: पूर्ण प्रतिबंध बच्चों के सूचना, अभिव्यक्ति और डिजिटल भागीदारी के अधिकारों को सीमित कर सकते हैं।
- असुरक्षित प्लेटफ़ॉर्म की ओर झुकाव का जोखिम: यदि मुख्यधारा प्लेटफ़ॉर्म प्रतिबंधित करते हैं, तो किशोर कम नियंत्रित या गुमनाम प्लेटफ़ॉर्म की ओर जा सकते हैं, जिससे उन्हें अधिक जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
- डिजिटल विभाजन का विस्तार: भारत में सोशल मीडिया अक्सर सीखने, जागरूकता और संचार का साधन है।
- प्रतिबंध वंचित वर्गों के बच्चों को अधिक प्रभावित कर सकते हैं, जो सूचना हेतु डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भर रहते हैं।
- लैंगिक डिजिटल विभाजन: परिवार इस प्रतिबंध का उपयोग लड़कियों की इंटरनेट पहुँच को पूरी तरह रोकने हेतु कर सकते हैं, जिससे डिजिटल लैंगिक अंतर और बढ़ सकता है।
ऑस्ट्रेलिया का सोशल मीडिया नियमन मॉडल
- ऑस्ट्रेलिया सोशल मीडिया उपयोग हेतु न्यूनतम आयु निर्धारित करने वाला प्रथम देश बना।
- ऑनलाइन सेफ़्टी संशोधन (सोशल मीडिया न्यूनतम आयु) अधिनियम के अंतर्गत:
- सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को 16 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं को अवरुद्ध करना होगा।
- प्लेटफ़ॉर्म को वर्तमान खातों की पहचान कर उन्हें हटाना होगा।
- नए खाते या वैकल्पिक उपायों को रोकना होगा।
- खाते हटाने में हुई त्रुटियों को सुधारने हेतु तंत्र होना चाहिए।
- ऑस्ट्रेलियाई कानून के पीछे तर्क
- उद्देश्य: बच्चों को ऑनलाइन जोखिमों और मनोवैज्ञानिक दबाव से बचाना।
- पहचानी गई समस्याएँ:
- नशे जैसी डिज़ाइन विशेषताएँ जो स्क्रीन समय बढ़ाती हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को प्रभावित करने वाली हानिकारक सामग्री।
- ऑस्ट्रेलियाई ई-सेफ्टी आयुक्त के सर्वेक्षण में पाया गया कि 50% से अधिक युवा ऑस्ट्रेलियाई सोशल मीडिया पर साइबरबुलिंग का शिकार हुए।
निष्कर्ष
- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमन, प्लेटफ़ॉर्म की ज़िम्मेदारी, डिजिटल साक्षरता और अभिभावकीय सहभागिता का संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है, ताकि उनके डिजिटल अधिकार एवं सूचना तक पहुँच भी सुरक्षित रह सके।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 06-03-2026